
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने पति-पत्नी के तलाक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए पत्नी की ट्रांसफर याचिका खारिज कर दी। जस्टिस रेखा बोराणा की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि न्याय का सिद्धांत दोनों पक्षों को समान रूप से देखने की मांग करता है—सिर्फ इस आधार पर कि महिला अक्सर पीड़ित मानी जाती है, पुरुष की कठिनाइयों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या था मामला
जयपुर निवासी पत्नी ने सिविल ट्रांसफर एप्लीकेशन दाखिल कर आग्रह किया था कि उसके पति द्वारा बीकानेर की फैमिली कोर्ट में दायर तलाक याचिका को जयपुर स्थानांतरित किया जाए। उसका कहना था कि वह 2005 से बच्चों के साथ जयपुर में रह रही है, वहीं काम कर अपना खर्च चलाती है और दोनों के बीच अन्य मुकदमे भी जयपुर में लंबित हैं, इसलिए तलाक प्रकरण भी वहीं सुना जाए।

पति की आपत्ति
पति पक्ष ने दलील दी कि वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है। उसकी मां कैंसर से जूझ रही है और पूरी तरह बिस्तर पर है, जबकि पिता 80 वर्ष से अधिक आयु के हैं। ऐसे में उनकी देखभाल और उपचार की जिम्मेदारी उसी पर है, इसलिए बार-बार जयपुर आना उसके लिए कठिन है।
सुनवाई के दौरान पति के वकील, एडवोकेट उदयशंकर आचार्य ने यह भी कहा कि यदि फैमिली कोर्ट पत्नी के पेशी खर्च के भुगतान का आदेश देती है तो पति वह राशि देने को तैयार है।
अदालत की टिप्पणी
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर कहा कि पत्नी ने जयपुर में लंबित अन्य मामलों का जिक्र तो किया, लेकिन उनका स्पष्ट ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया। आर्थिक असुविधा के सवाल पर अदालत ने माना कि जब पति खर्च वहन करने को तैयार है, तो बीकानेर की फैमिली कोर्ट प्रत्येक पेशी पर उचित व्यय दिलाने का आदेश पारित कर सकती है।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि मामला जयपुर स्थानांतरित किया जाता है तो पति को अधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि वह गंभीर रूप से बीमार मां और वृद्ध पिता की देखभाल कर रहा है। इन परिस्थितियों में ट्रांसफर का ठोस आधार नहीं बनता।
क्या रहा अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने पत्नी की सिविल ट्रांसफर अर्जी खारिज कर दी। साथ ही यह स्पष्ट किया कि यदि पत्नी पेशी खर्च के लिए आवेदन देती है तो संबंधित फैमिली कोर्ट कानून के अनुसार उस पर आदेश दे सकती है।
कानून क्या कहता है
सिविल मामलों में एक अदालत से दूसरी अदालत में केस स्थानांतरित करने का अधिकार हाईकोर्ट को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत प्राप्त है। ट्रांसफर तब किया जाता है जब किसी पक्ष को गंभीर असुविधा हो या निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होने की आशंका हो। अदालत निर्णय लेते समय दूरी, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक जिम्मेदारियों और अन्य प्रासंगिक तथ्यों का संतुलित मूल्यांकन करती है।

