इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अधिवक्ता द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी के खिलाफ चल रहे भरण-पोषण मामले का जल्दी निपटारा कराने की मांग की थी। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह याचिका अनावश्यक रूप से पत्नी को परेशान करने और भ्रामक आधार पर दायर की गई है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने याचिकाकर्ता पर 15 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
कोर्ट ने पाया कि पति ने कई अहम तथ्य छिपाए। वह शारीरिक रूप से सक्षम होने और वकालत से जुड़े होने के बावजूद अपनी आय को लेकर गलत जानकारी दे रहा था। इतना ही नहीं, अदालत में यह भी सामने आया कि उसने अपनी पत्नी के नाम पर लिए गए लोन का पैसा निजी खर्चों और शौक में उड़ा दिया।
पत्नी इलाहाबाद हाईकोर्ट में निजी सचिव, पति रहा बेरोजगार
मिली जानकारी के अनुसार, दंपति की शादी मई 2019 में हुई थी। शादी के बाद पत्नी को हाईकोर्ट में अपर निजी सचिव की नौकरी मिल गई, जबकि पति बेरोजगार ही रहा। बाद में दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ा और पति ने इटावा की फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ता मांगा, जहां उसे राहत भी मिली। इसके बावजूद उसने उच्च न्यायालय में खुद को बिना आय का बताते हुए नई याचिका दाखिल कर दी।
पत्नी की ओर से अदालत को बताया गया कि पति ने जमीन खरीदने का झांसा देकर उसके वेतन खाते के आधार पर बैंक से लाखों रुपये का पर्सनल लोन लिया। बाद में एक और बड़ा लोन भी इसी तरह लिया गया, जिसकी किस्तें पत्नी अब तक चुका रही है। आरोप है कि पति ने धोखे से यह रकम अपने खाते में ट्रांसफर कर ली और उसे फिजूलखर्ची में इस्तेमाल किया।
तंग आकर पत्नी ने तलाक की अर्जी भी दाखिल कर दी। इस बीच, फैमिली कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण के तौर पर हर महीने 5,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 10,000 रुपये देने का आदेश दिया था, जिसे पत्नी ने चुनौती दी है और मामला अभी लंबित है।
सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति द्वारा लोन की राशि का गलत इस्तेमाल किया गया है और उसकी याचिका में हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। अदालत ने आदेश दिया कि वह छह महीने के भीतर पत्नी को 15 लाख रुपये हर्जाने के रूप में अदा करे। यदि यह रकम समय पर नहीं दी गई, तो जिला प्रशासन इसे बकाया राजस्व की तरह वसूलेगा और उसकी संपत्तियों की जांच भी कराई जाएगी।


